मैं क्यों डरूँ ऐ दुनिया तुझसे?

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पहली बार जब खोली आँखें,
पहली बार जब ली थी साँसें,
माँ की गोद में सब सुंदर लगता था,
हर चेहरा मुझे देख हँसता था।

पापा की परी, माँ की मुनिया,
भाई की बहना, दादी की गुड़िया,
हर चेहरा मुझसे खुश था,
हर चेहरा मुझे देख हँसता था।

चाँद सी सुंदर, तारों सी रौशन,
फूल सी नाज़ुक, कली सी कोमल,
सबने यही कह कर पुकारा,
मैं सबकी आँख का तारा।

दिल में उमंग, आँखों में उत्साह संग,
देखे मैंने दुनिया के रंग,
समझ न पाई मैं कुछ बातों को,
उन चेहरों को, उन मुस्कानों को।

माँ से पूछा तो मैंने जाना,
लड़की होने का सच पहचाना,
लड़की हूँ, यहाँ बचकर रहना होगा,
लड़की हूँ, यहाँ डटकर रहना होगा।

मैं क्यों डरूँ ऐ दुनिया तुझसे?
मैं क्यों बचूं यहाँ सबसे?
क्यों अनभिज्ञ है इस बात से तू?
तेरा वजूद है तो मुझसे।

बड़ा अचिंत्य है ये राज़,
ये अजीब सी बात, वो अँधेरी रात,
मैं क्यों डरूँ ऐ दुनिया तुझसे?
मैं क्यों बचूं यहाँ सबसे?

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