कदम तू बढ़ने दे

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पथ की धूप से हार कर क्यों थम गया तू,
राह के काँटों से डर कर क्यों जम गया तू,
ज़रा दूर तक देख और कदम तो बढ़ने दे,
इन पैरों को ये धूप ज़रा सा और तू सहने दे।

नहीं कोई साथी है तेरा यहाँ,
बस तू और तेरी मंज़िल है जहाँ,
माँ का आशीष ले चला अकेला था तू,
उस आशीष की लाज को ज़रा और तू रहने दे।

तेरे सपनों के आगे सब खोया अपना,
तेरे चलने से है जिसका हर सपना,
मासूम सी उन आँखों में है तेरी काया,
उस पत्नी को तुझपे ऐतबार तो करने दे।

ये धूप छाँव का खेल है जीवन,
खुशी और ग़म का मेल है जीवन,
मत डर कल के तूफ़ानों से तू,
बुझती हुई इस ज्वाला को थोड़ा और तू जलने दे।

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